भारत में जेहाद

० ४ परिशिष्ट- १ संकलन- डॉ. कृ. व. पालीवाल


ये कुरान की वे आयतें हैं जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, जिहाद और घृणा फैलाने का संदेश देती हैं। सभी आयतें मक्तवा अल-हसनात, रामपुर (उत्तर प्रदेश) द्वारा प्रकाशित कुरान मजीद (१९८०) मुहम्मद फारुक खाँ के हिन्दी अनुवाद से ली गई हैं।
     
१. गैर-मुसलमान शत्रु समान

१. जो कोई अल्लाह और उसके 'फरिश्तों' और उसके 'रसूलों' और 'जिबरील' और 'मीकाइल' का शत्रु हुआ तो ऐसे 'काफिरों' का शत्रु अल्लाह है (२ : ९८, पृ. १४१)

२. निस्संदेह 'काफिर' तुम्हारे (ईमानवालों के) खुले दुश्मन हैं (४ : १०१, पृ. २३९)

३. और जो कोई अल्लाह और उसके 'रसूल' का विरोध करें तो निस्संदेह अल्लाह भी कड़ी सजा देने वाला है। (८ : १३, पृ. ३५१)

४. ओ ईमान वालो!'मुश्रिक' (मूर्तिपूजक) तो नापाक हैं। तो इस वर्ष के पश्चात्‌ ये 'मस्जिदें हराम' (काबा) के पास फटकने न पाऐं।' (९ : २८, पृ. ३७१)

५. निसंदेह अल्लाह ने 'काफिरों' के लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी हैं। (४ : १०२, पृ. २४०)

६. जिन लोगों ने कुफ़ किया और अल्लाह के मार्ग से रोका और 'काफ़िर' ही रहकर मर गए, अल्लाह उन्हें कदापि क्षमा न करेगा। (४७ : ३४, पृ. ९३४)

७. और काफिरों के लिए उसने दुःखदायिनी यातना तैयार कर रखी है। (३३ : ८, पृ. ७४६)

८. कह दो :  'अल्लाह' और 'रसूल' की आज्ञा का पालन करो। फिर यदि वे मुँह मोड़ें लो जान लें कि अल्लाह 'काफिरों' से प्रेम नहीं करता।' (३ : ३२, पृ. १९०)

९. निश्चय ही (भूमि पर) चलने वाले सबसे बुरे जीव अल्लाह की दृष्टि में वे लोग हैं जिन्होंने 'कुफ्ऱ' किया फिर वे ईमान नहीं लाते। (८ : ५५, पृ. ३५७)

१०. जो 'काफिर' हैं, जालिम वही हैं। (२ : २५४, पृ. १७१)
 

२.
  गैर-मुसलमानों से मित्रता न करो

१.   हे 'ईमानवालो' तुम 'यहूदियों' और 'ईसाईयों' को मित्र न बनाओ। वे आपस में एक दूसरे के मित्र हैं और जो कोई तुममें से उनको मित्र बनाएगा वह उन्हीं में से होगा।  (५ : ५१, पृ. २६७)

२.   हे ईमानवालो! तुमसे पहले जिनको 'किताब' दी गई थी, जिन्होंने तुम्हारे 'दीन' की हंसी और मेल बना लिया है उन्हें और    'काफिरों को अपना मित्र न बनाओ और अल्लाह से डरते रहा यदि तुम ईमान वाले हो। (५ : ५७, पृ. २६८)

३.  फिर हमने उनके बीच 'कियामत' के दिन तक के लिए वैमनस्य व द्वेष की आग भड़का दी। (५ : १४, पृ. २६०)

४.  वे चाहते हैं कि जिस तरह वे 'काफिर' हुए हैं उसी तरह तुम भी काफिर हो जाओ फिर तुम एक- जैसे हो जाओ। तो उनमें से किसी को साथी न बनाना, जब तक जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरे- संरक्षक मित्र बना लिए हैं, उनकी मिसाल ऐसी है जैसे मकड़ी हो जिसने एक घर बना रख है और निश्चय ही सब घरों में कमजोर घर मकड़ी का घर होता है। क्या ही अच्छा होता यदि ये लोग जानते। (२९ : ४१, पृ. ७०६)

५.   हे ईमानवालों! अपनों के सिवा दूसरों को अपना भेदी न बनाओ, ये तुम्हें क्षति पहुँचाने में कुछ भी उठा नहीं रखेंगे... इनका द्वेष तो इनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ इनके सीने छिपाए हुए हैं, वह इससे भी बढ़कर है। (३ : ११८, पृ. २०३)
६. हे ईमानवालो! अपने बापों और अपने भाइयों को अपना मित्र न बनाओ यदिवे ईमान की अपेक्षा कुछ को पसंद करें ओर तुममें से जो कोई उनसे मित्रता का नाता जोड़ेगा तो ऐसे ही लोग जालिम होंगे। (९ : २३, पृ. ३७०)

७.   ईमान लाने वालों को चाहिए कि वे ईमानवालों के विरुद्ध काफिरों को अपना संरक्षक-मित्र न बनाएँ और जो ऐसा करेगा तो उसका अल्लाह से कोई भी नाता नहीं। (३ : २८, पृ. १८९)

८.   हे 'ईमानवालो!' ईमानवालों के मुकाबलें में काफिरों को मित्र न बनाओ। क्या तुम अपने ही विरुद्ध अल्लाह के लिए एक स्पष्ट तर्क संचित करना चाहते हो। (४ : १४४, पृ. २४७)

९.   हे ईमानवालो! तुम मेरे दुश्मनों को और अपने दुश्मनों को अपना न बनाओ। (६० : १, पृ. १०२९)


 ३. गैर-मुसलमानों के लिए नर्क, आग और जहन्नम

१. और जो कोई अल्लाह और उसके 'रसूल' की अवज्ञा करेगा और उसकी सीमाओं से आगे बढ़ेगा, उसे अल्लाह आग (जहन्नम) में डालेगा, जहाँ उसे सदा रहना होगा ओर उसके लिए अपमानजनक यातना है (४ : १४, पृ. २२३)

२. जिन लोगों ने हमारी आयतों का इन्कार किया, उन्हें हम जल्द अग्नि में झोंक देंगे। जब उनकी खालें पक जाएँगी तो हम उन्हें और दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वादन कर लें। (४ : ५६, पृ.२३१)

३. निसंदेह जिन लोगों ने कुफ्र किया है किताबवालों और 'मिश्रकों' में से वे जहन्नम की आग में होंगे जहाँ वे सदा रहेंगे। यही लोग दुष्टतम हैं। (९८ : ६, पृ. ११८४)

४. यह बदला है अल्लाह के शत्रुओं का (जहन्नम की) आग। इसी में उनका सदा घर है, इसके बदले में कि हमारी 'आयतों' का इन्कार करते थे। (४१ : २८, पृ. ८६५)

५. (कहा जायेगा) घेर लाओ उन लोगों को जिन्होंने जुल्म किया और उनके जोड़ीवालों (पत्नियों) को और उसको जिसे ये पूजते थे अल्लाह के सिवा, फिर उन सबको भड़कती आग ('जहन्न्म') का मार्ग दिखाओ। (३७ : २२-२३, पृ. ७९९)

६. और जिन लोगों ने 'कुफ्र' किया और हमारी 'आयतों' को झुठलाया वही आग (जहन्नम में रहने) वाले हैं, वे उसमें सदैव रहेंगे। (२ : ३९, पृ. १३२)

७. यह है (तुम्हारी सजा) इसका मजा चखो, और यह भी (जान लो) कि काफिरों के लिए आग (जहन्नम) की यातनी है। 
(८ : १४, पृ. ३५१)

८. (कहा जायेगा) निश्चय ही तुम और वह जिसे तुम अल्लाह के सिवाय पूजते थे, 'जहन्नम' का ईधन हो। तुम अवश्य उसके घाट उतरोगे। (२१ : ९८, पृ. ५८५)

९. ये ('ईमानवाले' और 'काफिर') दो प्रतिवादी हैं जो अपने 'रब' के बारे मेंझगड़ते हैं। तो जिन लोगों ने कुफ्र किया, उनके लिए अग्नि के वस्त्र काटे जा चुके हैं- उनके सरिों पर खौलता हुआ पानी डाला जाएगा जिससे जो कुछ उनके पेटों में है वह और (उनकी) खालें गल जायेंगी और उनके लिए लोहे के गुर्ज़ (गदायें) होंगे (जिनसे उनकी गत बनाई जायेगी)। जब कभी वे दुःख के कारण उस ('जहन्नम') से निकलना चाहेंगे फिर उसी में लौटा दिए जायेंगे (कहा जायेगा) चखों मज़ा जलने की यातना का।            (२२ : १९ - २२, पृ. ५९२)

१०. एक ओर यह है और (दूसरी ओर) सरकशों के लिए निश्चय ही बुरा ठिकाना है 'जहन्नम' जिसमें वे प्रवेश करेंगे क्या ही बुरी आरामगाह है। यह लो चखो- खौलता हुआ पानी और पीप-रक्त साथ ही कुछ और इसी से मिलता जुलता, भिन्न-भिन्न प्रकार का। लो यह एक पूरा गिरोह तुम्हारे साथ घुसा चला आ रहा है। न मिले कोई जगह इनको। ये आग में जलने वाले हैं।
(३८ : ५५ - ५९, पृ. ८२४)

११. अल्लाह ने इन 'मुनाफिक' पुरुषों ओर 'मुनाफिक' स्त्रियों और 'काफिरों' से जहन्नम की आग का वादा किया है जिसमें वे सदा रहेंगे। यही उन्हें बस है। अल्लाह में उन्हें लानत की और उनके लिए स्थाई यातना है। (९ : ६८, पृ. ३७९)

१२. जिन्होंने'कुफ' किया और हमारी 'आयतों को झुठलाया वही लोग 'जहन्नम' वाले हैं। (५ : १०, पृ. २५९)

१३. वे (काफिर) चाहेंगे कि (जहन्नम की) आग से निकल जाएं परन्तु वे उससे निकल नहीं सकेंगे। उनके लिए स्थाई यातना है। (५ : ३७, पृ. २६४)

१४. (हे मुहम्मद) और 'मुनाफिक' पुरुषों और 'मुनाफिक' स्त्रियों ओर 'मुश्रिक' पुरुषों और 'मुश्रिक' स्त्रियों को य ातना दे, जो अल्लाह के बारे में बुरा गुमान रखते हैं। उन्हीं पर बुरा चक्कर आ पड़ा है और अल्लाह उन पर क्रुद्ध हुआ और उन पर लानत की, और उसने उनके लिए जहन्नम तैयार कर रखा है, और वह पहुँचने की बुरी जगह है। (४८ : ६, पृ. ९४०)

१५. और जिन लोगों ने हमारी 'आयतों' झुठलाया है उन्हें यातना पहुँच के रहेगी इसलिए कि वे अवज्ञा करते हैं। 
(६ : ४९, पृ. २८९)

१६. और जिन लोगों ने 'कुफ्र' किया है वे 'जहन्नम' की ओर फेर लाए जायेंगे ताकि अल्लाह नापाक को पाक से छांट कर अलग करे और नापाक को एक-दसूरे पर रखकर एक ढेर बनाए और फिर उसे 'जहन्नम' में झोंक दे। (८ : ३६ - ३७, पृ. ३५४)

१७. किसी नबी के लिए यह सम्भव नहीं कि उसके पास कैदी हों जब तक कि वह धरती में (विरोधी दल को) कुचल कर रख न दे। (८ :६७, पृ. ३५९)

१८. यह न समझो कि जिन लोगों ने 'कुफ्र' किया है वे धरती में हरा देने वाले हैं। उनका ठिकाना आग है- और वह क्या ही बुरा ठिकाना है। (२४ : ५७, पृ. ६३२)

१९. पकड़ो! इसको और जकड़ लो फिर (जहन्नम की) भड़कती आग में उसे डाल दो फिर एक जंजीर में जो सत्तर हाथ लम्बी है, इसे बाफ दो, यह महिमाशाली अल्लाह पर ईमान नहीं रखता है। (६९ : ३० - ३३, पृ. १०७१)

२०. जिन लोगों ने 'कुफ्र' किया उनसे कह दो (ओ मुहम्मद) कि जल्दी ही तुम पराजित होंगे और 'जहन्न्म' की ओर हो के जाओगे और वह क्या ही बुरा ठिकाना है (३.१२, पृ. १८७)

२१. और इसमें से जो लोग 'काफिर' हैं हमने उनके लिए दुःखद यातना तैयार कर रखी है। (४ : १६१, पृ. २५०)

२२. काफिरों के लिए अपमानित करने वाली यातना है। (२ : ९०पृ. १४०)




४. गैर-मुसलमानों से लड़ो और जान से मारो


१. फिर जब हराम महीने बत जाए, तो 'मुश्रिकों' को जहाँ- कहीं पाओ कत्ल करो, और उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। यदि वे 'तौबा' कर लें और 'नमाज' कायम करें और 'जकात' दें तो उनका मार्ग छोड़ दो। (९ : ५, पृ. ३६८)

२. हे 'ईमानवालो'! उन काफिरों से लड़ो जो तुम्हारे आसपास हैं और चाहिए कि वे तुममें सखती पाऐं। (९ : १२३, पृ. ३९१)

३. तुम पर युद्ध फर्ज किया गया, और वह तुम्हें अप्रिय है- और हो सकता है एक चीज तुम्हें बुरी लगे और वह तुम्हारे लिए अच्छी हो, और हो सकता है, कि एक चीज तुम्हें प्रिय हो और वह तुम्हारे लिए बुरी हो। अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते। 
(२ः २१६, पृ. १६२)

४. हे नबी! ईमानवालों को लड़ाई पर उभारो। यदि तुममें बीस जमे रहने वाले होंगे तो वे दो सौ पर भी प्रभुत्व प्राप्त करेंगे और यदि तुम में सौ हों तो वे एक हजार 'काफिरों' पर भारी रहेंगे क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझ बूझ नहीं रखते। (८ : ६५, पृ. ३५८)

५. जहाँ तक हो सके तुम लोग (सेना) शक्ति और बंधे हुए घोड़े उनके लिए तैयार रखें ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं और अपने शत्रुओं ओर इनके सिवा आरों को भय-भीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते। (८ : ६०, पृ. ३५७)

६. 'किताबवाले' जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं और न 'आखिरत', पर और न उसे 'हराम' करते हैं जिसे अल्लाह और उसके 'रसूल' ने 'हराम' ठहराया है और न सच्चे 'दीन' को अपना 'दीन' बनाते हैं, उनसे लड़ो यहाँ तक कि वे अप्रतिष्ठित होकर अपने हाथ से जिजिया देनेलगें (९ : २९, पृ. ३७२)

७. इन 'मुश्रिकों' के लिए अल्लाह और उसके 'रसूल' के नजदीक कोई सन्धि कैसे हो सकती है सिवाय उन लोगों के जिनसे तुमने 'मस्जिदे हराम' (काबा) के पास संधि की थी? (९ : ७, पृ. ३६८)

८. और यह कि जो 'आखिरत' पर 'ईमान' नहीं लाते, हमने उनके लिए दुःखदायिनी यातना तैयार कर रखी है। 
(१७ : १०, पृ. ५०८)

९. और जब हम किसी बस्ती को विनष्ट करने का इरादा कर लेते हैं तो हम वहाँ के सुखभोगी लोगों को हुक्म देते हैं किफर वे उसमें अवज्ञा करने लग जाते हैं, तब उस बस्ती पर वह (यातना की) बात साबित हो जाती है, फिर हम उसे बिल्कुल लड़ से उखाड़ फैंकते हैं। (१७ : १६, पृ. ५०९)

१०. जिन लोगों ने कुफ्र किया वे यह न समझे कि वे बाजी ले गए। वे कभी हरा नहीं सकते। (८ : ५९, पृ. ३५७)

११. और उनसे युद्ध करो जिहाँ तक कि फितना शेष न रहे और 'दीन' अल्लाह का हो जाए। (२ : १९३, पृ. १५८)

१२. और अल्लाह की राह में युद्ध करो और जान लो कि अल्लाह सुनने और जानने वाला है। (२ : २४४, पृ. १६९)

१३. जो लोग सांसारिक जीवन के बदले 'आखिरत' का सौदा करें,उन्हें चाहिए कि अल्लाह के मार्ग में युद्ध करें। जो अल्लाह के मार्ग में युद्धकरेगा तो चाहे वह मारा जाए या विजयी हो, उसे जल्द हम बड़ा पुरस्कार प्रदान करेंगे। (४ : ७४, पृ. २३४)

१४. जो लोग 'ईमान' लाए अल्लाह के मार्ग में युद्ध करते हैं। और जिन लोगों में कुफ्र किया वे मूर्तियों के मार्ग में युद्ध करते हैं। तो तुम शैतान के साथियों से लड़ों। (४ : ७६, पृ. २३४)

१५. और तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि फितना (उपद्रव) बाकी न हरे और दीन (धर्म) पूरा-का-पूरा अल्लाह के लिए हो जाए। 
(८ : ३९, पृ. ३५४)

१६. तो यदि ये लोग तुम्हें लड़ाई में मिल जाएं तो (इनकी खबर लेकर) इनके द्वारा उन लोगों को भगा दो जो उनके पीछे हैं। कदाचित्‌ वे चेतें (८ : ५७, पृ. ३५७)

१७. अब जब कुफ्र करने वालों से तुम्हारी मुठ-भेड़ हा तो गरदनें मारना, यहाँ तक कि जब तक उन्हें कुचल चुको तो बन्धनों में जकड़ो।'' (४७ : ४, पृ. ९२९)

१८. निसंदेह अल्लाह उन लोगों से प्रेम रखता है जो उसके मार्ग में पंक्ति बद्ध होकर लड़ते हैं मानो वे सीसा पिलाई हुई (मजबूत) दीवार हैं। (६१ : ४, पृ. १०३४)

१९. जो लोग विरोध करते हैं 'अल्लाह' का और उसके 'रसूल' का वे बुरी तरह परास्त हुए जैसे वे लोग हुए जो इनसे पहले थे और हमने खुली खुली आयतें उतारदी हैं और 'काफिरों' के लिए अपमानजनक यातनाएँ हैं। (५८ : ५, पृ. १०१६)

२०. और अपराधियों को जहन्नम की और हाँककर उसके घाट पहुँचा देंगे। (१९ : ८६, पृ. ५५३)

२१. और हराम (असम्भव) था हर उस बस्ती के लिए (पलटना) जिसको हमने विनष्ट कर दिया था। निश्चय ही वे पलटने वाले थे। (२१ : ९५, पृ. ५८४)

२२. हे ईमानवालो! जब तुम एक सेना के रूप में 'काफिरों' से भिड़ो तो उनसे पीठ न फेरो। (८ : १५, पृ. ३५१)

२३. यह है (मामला), और यह (जान लो) कि अल्लाह 'काफिरों की चालों को कमजोर करने वाला है। (८ : १८, पृ. ३५१)

२४. यदि तुममें से सौ जमे रहने वाले होंगे तो वे दो सौ पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेंगे और यदि तुममें हजार होंगे तो दो हजार पर अल्लाह के हुक्म से भारी रहेंगे। (८ : ६६, पृ. ३५८)

२५. कि वे अल्लाह की राह में हिजरत न करें और यदि वे इससे फिर जाएं तो उन्हें जहाँ कहीं पाओ पकड़ो और उनका वध करो और उनमें से किसी को साथी और सहायक न बनाना।(४ : ८९, पृ. २३७)

२६. तो अवश्य हम कुफ्र करने वालों को यातना का मजा चखाएंगे, और अवश्य ही हम इन्हें सबसे बुरा बदला देंगे उस काम को जो वे करते थे (४१ : २७, पृ.८६५)

२७. तुमने उन्हें कत्ल नहीं किया, बल्कि अल्लाह ने उन्हें कत्ल किया। (८ : १७, पृ. ३५१)

२८. फिटकारे हुए, जहाँ कहीं पाए जाएंगे पकड़े जायेंगे और बुरी तरह कत्ल किए जाएंगे (३३ : ६१, पृ. ७५९)

२९. तो तुम उन लोगों को जो 'ईमान' ला चुके हैं, जमाए रखो। मैं अभी 'काफिरों' के दिलों में रौब डाले देता हूँ। तो तुम उनकी गरदनों पर मारो और उनके हर जोड़ पर चोट लगाओ।(८ : १२, पृ. ३५०)

३०. उनसे ('काफिरों') लड़ो अल्लाह तुम्हारे हाथों उन्हें यातना देगा, और उन्हें रुसवा करेगा और उनके मुकाबले में तुम्हारी सहायता करेगा। (९ : १४, पृ. ३६९)

३१. यदि तुम न निकलोगे तो अल्लाह तुम्हें दुःख देने वाली यातना देगा, और तुम्हारे सिवा किसी और गिरोह को ले आएगा। 
(९ : ३९, पृ. ३७४)

३२. ताकि अल्लाह 'मुनाफिक' पुरुषों और 'मुनाफ़िक' स्त्रियों और 'मुश्रिक' पुरुषों और 'मुश्रिक' स्त्रियों को दण्ड दें। 
(३३ : ७३, पृ. ७६०)

३३. और अल्लाह की राह में उन लोगों से युद्ध करो। (२ : १९०, पृ. १५७)

३४. अल्लाह के साथ शिर्क (बहुदेवतावाद) न करना (३१ : १३, पृ. ७२७)

३५. और उसके बढ़कर जालिम कौन होगा जिसे उसके 'रब' की 'आयतों' के द्वाराचेताया जाए, और फिर वह उनसे मुँह फेर ले। निश्चय ही हमें ऐसे अपराधियों से बदला लेना है।(३२ : २२, पृ. ७३६)

३६. जो लोग अल्लाह और 'रसूल' से लड़ते हैं और धरती में बिगाड़ पैदा करने के लिए दौड़ धूप करते हैं, उनकी सजा यही है कि बुरी तरह कत्ल किए जाएं या रसूली पर चढ़ाये जाएं या उनके हाथ और उनके पांव विपरीत दिशाओं से काट डाले जाएं। या उनको देश निकाला दे दिया जाए। यह रुसवाई तो उनके लिए दुनिया में है और 'आखिरत' में उनके लिए बड़ी यातना है। 
(५.३३, पृ. २६३)

३७. और यदि तुम अल्लाह के मार्ग में मारे गए या मर गए, तो अल्लाह की क्षमा और दयालुता उन सब चीजों से है जिन्हें ये लोग इकट्‌ठे करते हैं। और चाहे तुम करे या मारे गए अल्लाह ही के पास इकट्‌ठे किए जाओगे। (३ : १५७ - १५८, पृ. २०९)

३८. और जो अल्लाह के मार्ग में मारे गए, उन्हें मरा हुआ न समझो। बल्कि वे अपने 'रब' के पास जीवित हैं, रोजी पा रहे हैं।
 (३ : १६ ९, पृ. २११)



५.
गैर-मुसलमानों के विरुद्ध लड़ो और जिहाद करो

१. तो 'काफिरों' की बात न मानना और इस (कुरान) से तुम उनसे बड़ा 'जिहाद' करो। (२५ : ५२, पृ. ६४३)

२. निकल पड़ो, चाहे हल्के हो याबोझल, और अपने मालों और जानों के साथ अल्लाह के मार्ग में 'जिहाद' करो। यह तुम्हारे लिए अच्छा है यदि तुम जानो। (९ : ४१, पृ. ३७५)

३. निश्चय ही लोग 'ईमान' लाए और 'हिजरत' की और अल्लाह के मार्ग में अपनी जान और अपने माल से 'जिहाद' किया और जिन लोगों ने (हिजरत करने वालों को) जगह दी और सहायता की- वे एक-दूसरे के संरक्षक हैं मित्र हैं। और जो जिन लोगों ने हमारे हेतु कष्ट किया हम उनहें अपने मार्ग दिखा देंगे और निसंदेह अल्लाह उत्तमकारी के साथ है। (२९ : ६९, पृ. ७११)

४. हे नबी! 'काफिरों' और 'मुनाफिकों' के साथ 'जिहाद' करो ओर उन पर सखती करो और उनका ठिकाना 'जहन्नम' है 
(६६ : ९, पृ. १०५५)

५. और उन लोगों को जो अल्लाह के मार्ग में मारे जाते हैं, मुरदा न कहो, वे तो जीवित हैं परन्तु तुम्हें इसकी अनुभूति नहीं होती। (२ : १५४, पृ. १५०)

६. उसकी (अल्लाह की) राह में 'जिहाद' करो (५ : ३५, पृ. २६३)

७. और जिन लोगों ने अल्लाह के मार्ग में घर बार छोड़ा। फिर कत्ल कर दिए गये या मर गये, अल्लाह उन्हें अच्छी रोजी प्रदान करेगा। (२२ : ५०, पृ. ५९८)

८. और कहते हैं कि कोई व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं कर सकतासिवाय उसके जो यहूदी या ईसाई है। ये उनकी कामनाएँ हैं कहो : यदि तुम सच्चे हो तो अपने प्रमाण प्रस्तुत करो।(२ : १११, पृ. १४३)

९. ईमान वाले तो बस वे हैं जो अल्लाह पर और उसके 'रसूल' पर ईमान लाए फिर संदेह में नहीं पड़े और अपने मालों और अपनी जानों को अल्लाह की राह में लगा दिया यही लोग सच्चे हैं। (४९ : १५, पृ. ९५२)

१०. हे 'ईमानवाले!' क्या मै तुम्हें एक ऐसा व्यापार बताऊ जो तुम को एक दुःख भरी यातना से बचा ले। ईमान रखो अल्लाह और उसके 'रसूल' पर और जिहाद' करो अल्लाह के मार्ग अपने मालों और आपनी जानों से यह तुम्हारे लिए उत्तम है यदि तुम ज्ञान रखते हो। वह तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा और तुम्हें ऐसे बागों में दाखिल करेगा कि जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी और अच्छे अच्छे घरों में जो सदा के बागों में होंगे। यह है बड़ी सफलता।(६१ : १० - १२, पृ. १०३५)

११. और अल्लाह को छोड़कर वे उसको पूजते हैं जो न उन्हें लाभ पहुँचा  सकता है और न हानि पहुँचा जा सकता है। और 'काफिर' अपने 'रब' के मुकाबले में (विद्रोहियों का) पृष्ठ पोषक बना हुआ है। (२५ : ५५, पृ. ६४४)

१२. जो लोग अल्लाह पर औरअन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं वे कभी तुमसे इसकी इजाजत नहीं मांगेंगे कि अपने माल और अपनी जानों के साथ 'जिहाद' न करे। अल्लाह उन लोगों को मानता है जो डरने वाले हैं। (९ : ४४, पृ. ३७६)

१३. ह नबी! 'काफिरो' और मुनाफिकों' से 'जिहाद' करा! और उनके साथ रूढ़ती से पेश आओ। उनका ठिकाना 'जहन्नम' है और वह क्या ही बुरा ठिकाना है। (९ : ७३, पृ. ३८०)

१४. हे 'ईमाननवालो'। तुम्हें क्या हो गया कि जब तुमसे कहा गया कि अल्लाह के मार्ग में निकलो, तो तुम घर तो पर ढ़ह गए। क्या तुम 'आखिरत' को छोड़कर सांसारिक जीवन पर राजी हो गए? तो सांसारिक जीवन की सुख सामग्री 'आखिरत' की अपेक्षा बहुत थोड़ी है। (९ : ३७, पृ. ३७४)

१५. निसंदेह महीनों की गिनती-अल्लाह की किताब में उस दिन से कि उसने आकाशों और धरती को पैदा किया- अल्लाह की दृष्टि में बारह महीनों की है। इनमें चार आदर के हैं। यही सीधा दीन (धर्म) है। तो तुम इनमें (युद्ध और रक्तपात करके) अपने-आप पर जुल्म न करो। और तुम सब मिलकर 'मुश्रिकों' से लड़ो जिस तरह वे सब मिलकर तुम से लड़ते हैं। और जान लो कि अल्लाह उन लोगों के साथ है जो डरने वाले (अल्लाह से) हैं। (९: ३६, पृ. ३७३)

१६. जो लोग ईमान लाए और हिजरत की और अल्लाह की राह में अपने माल और अपनी जानों से जिहाद किया अल्लाह के यहाँ 
(उनके लिए) बड़ा दर्जा है। और वही हैं जो सफलता प्राप्त करने वाले हैं। उन्हें उनका रब शुभ सूचना देता है, अपनी दयालुता और रजामंदी की, और ऐसे बागों (जन्न्त) की जिनमें उनके लिए स्थायी सुख है। उनमें वे सदैव रहेंगे। निसंदेह अल्लाह के पास बड़ा बदला (इनाम) है। (९ : २० - २२, पृ. ३७०)

१७. औजर जान लो कि जो चीज 'गनीमत' के रूप् में तुमने प्राप्त की है उसका पाँचवा भाग अल्लाह का, रसूल का और (रसूल के) नातेदारों का, और अनाथों और मुहताजों और मुसाफिरों का है। (८ : ४१? पु. ३५४)

१८. निश्चय ही जो लोग 'ईमान' लाए और 'हिजरत' की और अल्लाह के मार्ग में अपनी जान और अपने माल से जिहाद किया और जिन लोगों ने (हिज्ररत करने वालों को) जगह दी और सहायता की, वे एक-दूसरे के संरक्षक-मित्र हैं और जो लोग 'ईमान' ले आए परन्तु हिजरत नहीं की, तो उनसे तुम्हारा संरक्षण (और मैत्री आदि) का कोई सम्बन्ध नहीं है जब तक कि वे हिजरत न करें। 
(८ : ७२, पृ. ३६०)

१९. तो (हे मुश्रिको!) इस भू-भाग में चारमहीने और चल फिर लो और मान लो कि तुम अल्लाह को हरा नहीं सकते और यह कि अल्लाह 'काफिरों' को अपमानित करने वाला है। और अल्लाह और उसके 'रसूल' की ओर से बड़े हज्ज के दिन लोगों के लिए मुनादी की जाती है कि अल्लाह मुश्रिकों (के प्रति जिम्मेदारी) से बरी है, और उसका रसूल भी। तो, यदि तुम लोग तौबा कर लो, तो तुम्हारे ही लिए अच्छा है, परन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो तो जान लो कि तुम अल्लाह को हरा नहीं सकते। और जिन लोगों ने कुफ्र किया है उन्हें दुःख देने वाली यातना की मंगल सूचना दे दो। (९ : २ - ३, पृ. ३६७)

२०. बिना किसी आपत्ति के बैठे रहने वाले 'मोमिन' और अपने धन और प्राणों के साथ अल्लाह के मार्ग में 'जिहाद' करने वाले बराबर नहीं हो सकते। अल्लाह ने बैठे रहने वालों की अपेक्षा अपने धन और प्राणों से 'जिहाद' करने वालों का एक दर्जा बड़ा रखा है। (४ : ९५, पृ. २३८)

२१. और जो कोई अपने घर से अल्लाह और उसके 'रसूल' की ओर  'हिजरत' करके निकले, फिर उसकी मृत्यु आ जाए, तो उसका प्रतिदान अल्लाह के जिम्मे हो गया। (४ : १००, पृ. २३९)

२२. तो तुम अल्लाह के मार्ग में युद्ध करो- तुम पर अपने सिवा किसी और कादायित्व नहीं- और ईमानवालों को भी इसके लिए उभारो! हो सकता है अल्लाह 'काफिरों' का जोर तोड़ दे। (४ : ८४, पृ. २३६)

२३. किसी न किसी समय 'कुफ्र' करने वाले कामना करेंगे कि क्या ही अच्छा होता कि 'मुस्लिम' होते। (१५. २, पृ. ४७३)

२४. निश्चय ही अल्लाह का डर रखने वाले ऐसे स्थान में होंगे जहाँ कोई खटका न होगा। बागों और जल-स्रोतों के बीच, पतले और गाढ़े  रेशमी वस्त्र पहनेंगे और एक-दूसरे के आमने-सामने होंगे। यह होगा! और हम उनका विवाह बड़ी और सुन्दर आँखों वाली हपरम रूपवती स्त्रियों से कर देंगे। वे वहाँ निश्चिन्ततापूर्वक हर प्रकार के मेवे तलब करते होंगे। वे वहाँ मृत्यु का मजा कभी न चखेंगे बस पहली मृत्यु (दुनिया में) जो चुकी वह आ चुकी। और वह उन्हें भड़कती अग्नि (जहन्नम) की यातना से बचा देगा। यह सब अनुग्रह होगा तेरे 'रब' का। यही बड़ी सफलता है। (४४ : ५१ - ५७, पृ. ९०७ - ९०८)




६.
मुसलमानों प्रेम और काफिरों को जहन्नम का दण्ड

१. यह इसलिए कि इन लोगों ने अल्लाह ओर उसके 'रसूल' का विरोध किया  और जो कोई अल्लाह ओर उसके 'रसूल' का विरोध करे, तो निःसंदेह अल्लाह भी कड़ी सजा देने वाला है। (८ :१३, पृ. ३५१)

२. जो कोई अल्लाह के साथ (किसी को) शरीक करेगा उस पर अल्लाह ने 'जन्नत' हराम कर दी है और उसका ठिकाना आग (जहन्न्म) है और जालिमों का कोई सहायक नहीं। (५ : ७२, पृ. २७१)

. तो जो लोग 'ईमान ले आए' अल्लाह ने उन्हें अपनी अनुज्ञा से उस सच्चाई का मार्ग दिखा दिया, जिसमें लोगों ने मतभेद किया था अल्लाह जिसे चाहता है, सीधा मार्ग दिखा देता है। (२ : २१३, पृ. १६१)

४. 'मुश्रिक' स्त्रियों से जब तक वे 'ईमान' न लाएं विवाह न करो। ईमानवाली एक लौंडभ् एक 'मुश्रिक' स्त्री से अच्छी है, यद्यपि वह तुम्हें भली लगे। और 'मुश्रिक' पुरुषों से (अपनी स्त्रियों का) विवाह न करो जब तक कि वे ईमान न लाएँ। ईमानवाला एक गुलाम एक 'मुश्रिक' से अच्छा है यद्यपि वह भला लगे।  (२ : २२१, पृ. १६३)

५. और जो कोई अल्लाह का और उसके रसूल का हुक्म मानेगा, उसे वह ऐसे बागों (जन्न्त) में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, और जो कोई पलट जायेगा, उसे वह दुःखदायिनी यातना देगा। (४८ : १७, पृ. ९४२)

६. निश्चय ही अल्लाह उन लोगों को जो ईमान लाये ओर अनुकूल कर्म किए ऐसे बागों में (जन्नत) दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें वह रही होंगी,और कुफ्र करने वाले सुख (सांसारिक) भोग रहे हैं और खाते हैं जैसे जानवर खाते हैं और ('जहन्नम' की) आग उनका ठिकाना है। (४७ : १२, पृ. ९३०)

७. 'नमाज' कायम करो और 'जकात' दो और 'रसूल' का हुक्म मानो ताकि तुम पर दया की जाए। (२४ : ५६, पृ. ६३२)

८. उस दिन 'जन्नत' वालों के ठहरने की जगह भी उत्तम होगी और दोपहर में आराम करने को स्थान भी बहुत अच्छा होगा... वह दिन काफिरों के लिए कठिन होगा। (२५ : २४ - २६, पृ. ६४०) 

९. और हम में कुछ तो मुस्लिम हैं और हममें कुछ मार्ग से फिरे हुए हैं। तो जो मुस्लिम हुए उन्होंने तो भलाई का मार्ग पसन्द कर लिया। रहे वे लोग जो मार्ग से फिरे हुए हैं। तो वे 'जहन्नम' का ईंधन हुए (७२ : १५ - १५, पृ. १०८६)

१०. हम तुमसे और अल्लाह के सिवा जिसे भी तुम पूजते हो उससे अलग हैं हम तुम्हें नजही मानते। और हमारे और तुम्हारे बीच सदा के लिए शत्रुता और विद्वेष उभर आया है जब तक कि तुम अकेले अल्लाह पर 'ईमान' न लाओ- बस यह है कि इब्राहिम ने अपने बाप से इतनी बात कह दी थी कि मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करना मेरे बस में नहीं है (६० : ४, पृ. १०३०)

११. मुहम्मद अल्लाह के 'रसूल' हैं। औरजो लोग उनके साथ हैं वे 'काफिरों' के मुकाबले में कठोर और आपस में दयालु हैं। 
(४८ : २९, पृ. ९४५)

१२. ये वे लोग हैं जिन पर अल्लाह ने लानत की फिर उन्हें बहरा कर दिया और उनकी आँखों को अन्धा कर दिया। 
(४७ : २३, पृ. ९३२)

१३. तो इन 'काफिरों' पर अल्लाह की फिटकार है। (२ : ८९, पृ. १४०)

१४. फिर जब उन्होंने हमारी यातना देखी, तो कहने लगे- हम अल्लाह पर जो अकेला है, ईमान लाए और जिस (किसी) को हम उसका सहयोगी ठहराते थे उसको हमने छोड़ दिया। परन्तु ऐसा न था कि उनका 'ईमान' लाना उनके काम आता जबकि उन्होंने हमारी यातना को देख लिया- यह अल्लाह की रीति है जो उसके बन्दों में पहले से चली आई है- और उस समय 'काफिर' टोटे में पड़ गए। (४० : ८४ - ८५, पृ. ८५८)

१५. जो हमारी 'आयतों पर ईमान' लाए और मुस्लिम थे- दाखिल हो जाओ जन्नत में पूरी खुशियों के साथ तुम और तुम्हारे संघाती (पत्नी) उस ('जन्नत वालों') के आगे सोने की तश्तरियों और प्याले गर्दिश करेंगे और वहाँ हर वह चीज होगी आत्माएं जिसे चाहें और आँखें जिससे लज्जत पाएं और तुम उसमें सदैव रहोगे और यह वह 'जन्नत' है जिसके तुम वारिस बनाए गए उनकर्मों के बदले में जो तुम करते थे। तुम्हारे लिए यहाँ बहुत मेवे हैं जिन्हें तुम खाओगे। (४३ : ६९ - ७३, पृ. ८९७)

१६. (हे नबी) कह दो! हे लोगों मैं तो बस तुम्हारे लिए एक प्रत्यक्ष सचेत करने वाला हूँ। तो जो लोग 'ईमान लाये और अनुकूल कर्म किए, उनके लिए क्षमा और सम्मानित आजीविका है और जिन लोगों ने हमारी आयतों के बारे में हमें हराने के लिए विरोध-भाव से दौड़-धूप की, वहीं भड़कती आग (जहन्नत में रहने) वाले हैं। (२२ : ४९ - ५९, पृ. ५९७)

१७. राज्य उस दिन (कयामत) अल्लाह का होगा। वह उनके बीच फैसला करेगा। तो जो लोग 'ईमान' लाए और अनुकूल कर्म किए वे नेमत भरी जन्नतों में होंगे। और जिन लोगों ने कुफ्र किया और हमारी आयतों को झुठलाया, उनके लिए अपमानजनक यातना होगी। (२२ : ५६ - ५७, पृ. ५९८)


७. मुसलमान आपस में भाई-भाई


१. और यदि ईमानवालों के दो गिरोह परस्पर लड़ पडे तो उनके बीच सुलह-सफाई करा दो। (४९ : ९, पृ. ९५०)

२. ईमानवाले तो भाई-भाई हैं। तो अपने दो भाइयों के बीच सुलह-सफाई करा दो और अल्लाह का डर रखो ताकि तुम पर दया की जाए। (४९ : १०, पृ. ९५०)

३. तो यदि ये 'तौबा' करलें और 'नमाज' कायम करें और 'जकात' दे ंतो तुम्हारे 'दीनी' भाई हैं। और जानने वालों के लिए हम अपनी 'आयतें' खोल-खोलकर बयान करते हैं। (९ : ११, पृ. ३६९)



८.
अल्लाह के अलावा किसी अन्य को न पूजो

१. अल्लाह और उसके 'रसूल' के हुक्म पर चलो, आपस में न झगड़ो नही ंतो तुम में कमजोरी आ जाएगी और तुम्हारी हवा उखड़ जायेगी; और धैर्य से काम लो! (८ : ४६, पृ. ३५५)

२. (हे मुहम्मद!) हमने तुम्हें लोगों के लिए 'रसूल' बना कर भेजा है और (इस पर) गवाह की हैसियत से अल्लाह काफी है। जिसने 'रसूल' का आदेश माना वास्तव में उसने अल्लाह का  (4: ७९ - ८०, पृ. २३५)

३. हे वे लोगों जो ईमान लाये हो! अल्लाह का हुक्म मानो और 'रसूल' का हुक्म मानो, औश्र अपना किया- धरा बरबाद न करो। 
(४७ : ३३, पृ. ९३४)

. वही है जिसने अपने 'रसूल' को मार्गदर्शन और सच्चे 'दीन' (सत्य धर्म) के साथ भेजा, ताकि उसे समस्त 'दीन' पर प्रभुत्व प्रदान करे, चाहे मुश्रिकों (मूर्ति पूजकों) को यह ना पसन्द ही क्यों न हो। (९ : ३३, पृ. ३७३)



९. गैर-मुसलमानों के प्रति पक्षपातपूर्ण आदेश

१. अल्लाह उनको मार्ग नहीं दिखाता जो अवज्ञाकारी हैं। (९ :२४, पृ. ३७१)

२. अल्लाह 'काफिरों' को मार्ग नहीं दिखाता (९ : ३७, पृ. ३७४)

३. तो मेरा डर रखो, हे बुद्धि वालो! (२ : १९७, पृ. १५९)

४. हे लोगों! टपने 'रब' का डर रखो। निश्चय ही उस घड़ी का भूकम्प बड़ी (भयानक) चीज है। (२२ : १, पृ. ५८९)

५. और यदि तेरा 'रब' चाहता तो धरती में जितने लोग हैं, वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तू लोगों को विवश करेगा कि वे 'ईमान' वाले हो जाएं। (१० : ९९, पृ. ४१०)

६. और अल्लाह के सिवा किसी ऐसे को न पुकार, जो न तुझे लाभ पहुँचा सके और न हानि, तूने ऐसा किया तो तू जालिमों में से होगा। ( १० : १०६, पृ. ४११) 

७. और (बादलों की) गरज और फिरिश्ते उसे भय के कारण उसी की प्रशंसा के साथ 'तसबीह' करते हैं वह कड़कड़ाती बिजलियाँ भेजता है फिर उन्हें यजिस पर चाहता है, गिरा देता है। (१३ : १३, पृ. ४५६(१३ : १३, पृ. ४५६)

८. और याद करो जब तुम्हारे 'रब' ने तुम्हें सूचित कर दिया था कि तुमने कृतज्ञता दिखलाई तो मैं तुम्हें और अधिक दूँगा; और यदि अकृतज्ञ बने, तो मेरी यातना बहुत सखत है(१४ : ७, पृ. ४६५)

९. और इससे पथभ्रष्ट वह केवल उन्हीं लोगों को करता है जो अवज्ञाकारीहोते हैं। (२ : २६, पृ. १३०)

१०. अल्लाह काफिरों को घेरे हुए है। (२ : १९, पृ. १२९)

११. जिसे अल्लाह मार्ग से भटका दे उसे कोई मार्ग पर लाने वाला नहीं। (७ : १८६, पृ. ३४२)

१२. अल्लाह जालिमों को सीधा मार्ग नहीं दिखाया करता। (२ : २५८, पृ. १७३)

१३. अल्लाह उसका तुमसे हिसाब लेगा। फिर जिसे चाहेगा क्षमा करेगा और जिसे चाहेगा यातना देगा, अल्लाह को हर चीज की सामर्थ्य प्राप्त है। (२ : २८४, पृ. १७९)

१४. और अल्लाह के मार्ग में खर्च करो। (२ : १९५, पृ. १५८)

१५. वह जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है। (२ : १४२, पृ. १४८)

१६. जो 'इस्लाम' के सिवा कोई और 'दीन' चाहेगा तो वह कभी उससे (अल्लाह से) कबूल नहीं किया जाएगा और वह 'आखिरत' में टोटा पाने वालों में से होगा। (३ : ८५, पृ. १९८)

१७. निश्चय ही उन लोगों ने कुफ्र किया जिन्होंने कहा ''अल्लाह'' तो तीन में का एक है, हालांकि अकेले इलाह (पूज्य) के सिवा कोई इलाह नहीं है। (५ : ७३, पृ. २७१)




Selected Bibliography

1.           The Koran– ed. N. J. Dawood. Penguin. 4th Edn. 1973.
2.           Glorious Koran Md. Marmaduke Pickthall. New American Library. London.
3.           Hadis– Shahi Bukhari, Shahi Trimzi.
4.           The Hidayah of Burhanuddin Ali. Trans. C. Hamilton, 1791. New Delhi reprint. 1985.
5.           Tuhfat-ul-Mujaheedin trans. M.J. Rowlandson, London, 1933
6.           This is jihad. Anwar Shaikh, Cardiff. 1999.
7.           Islam : Arab National movement, Anwar Shaikh. Cardiff 1999.
8.           Dictionary of Islam. T.P. Hughes, 1885. Indian reprint 1976.
9.           The Life Mohomet. Sir William Muir. London 1894. Indian reprint 1992 (Voice of India).
10.       Mohammed & the Rise of Islam. D.S. Margoliouth, London. 1905 Indian reprint 1985 (Voice of India).
11.       Understanding Islam through Hadis. Ram Swarup, voice of India 1987.
12.     The Quaranic Concept of War. Bring. S. K. Malik, with a forward by Gen. Zia-ul-Haq. Lahore 1979.              Delhi reprint. 1986.
13.       Akbar-nama of Abul Fazl. Trns. H. Beveridge. Delhi Reprint 1993.
14.       Babur-nama of Babur. Trns. A.S. Beveridge, Delhi Reprint 1979.
15.       The History of India as told by its own Historians Elliot & Downson. [Collection of Arabis & Persian Chronicles.] vol-I, II, III, IV, V, VI, VII. Delhireprint. 1990.
16.       Akbar the Great Moghul. V. Smith. Delhi Reprint 1962.
17.       Fall of the Mughal Empire. ISir Jadunath Sarkar. Delhi. Reprint 1991.
18.       History of Aurangzeb. Sir Jadunath Sarkar. New Delhi. Reprint. 1972.
19.       R. C. Majumdar (ed). The History and Culture of the Indian People. Vol-VI, VII, Bharatiya Vidya Bhavan, Bombay 1973.
20.       A Forgotten Empire, Robert Sewell, Delhi Reprint, 1962.
21.       Guru Tegh Bahadur. Ranbir Singh. Hind Books. Delhi 1976.
22.       The History of Tipu Sultan. Kabir Kausar.
23.       History of the Khiliji's Prof. K. S. Lal. Delhi 1988.
24.       The Mughal Harem. Prof. K.S. Lal. Delhi 1988.
25.       Hindu Temples : What happened to them : Sitaram Goel. Voice of India.
26.       Negatinsism in India : Concealing Records of Islam. K. Elst. Voice of India. 1992.
27.       The Rehla of Ibn Batutah. Eng. Trns. By  Dr. Mahadi Hussain 1953.
28.       Voyages of East Indies : Fra Bartolomaco-Jaico Books– 1974.
29.       Travels in the Mughal Empire. Francois Bernier. Revised & edited by V. Smith. Oxford 1934. Reprint 1978.
30.       Alberuni's India. Trns. Edward Sachan. London 1910.
31.       History of Mysore, C. H. Rao, vol-II & III.
32.       Freedom struggle in Kerala-Sardar K.M. Panickar

Comments

Popular posts from this blog

धर्म के दस लक्षण

कट्टर सोच की अँधेरी गुफा

101 स्वदेशी चिकित्सा 1 राजीव दीक्षित