धर्म के दस लक्षण

मनुस्मृती से:-

मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाए हैं:

धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह: ।

धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌ ।। (मनुस्‍मृति ६
अर्थात - धैर्य , क्षमा , संयम , चोरी न करना , शौच ( स्वच्छता ), इन्द्रियों को वश मे रखना , बुद्धि , विद्या , सत्य और क्रोध न करना - ये दस   धर्म के लक्षण हैं.

 

याज्ञवल्क्य के अनुसार:-

अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह: ।

दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌ ।।

अर्थात - अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना) , दान, संयम (दम) , दया एवं शान्ति - धर्म के ये नौ लक्षण है.

 

पद्मपुराण कहता है:-

ब्रह्मचर्येण सत्येन तपसा च प्रवर्तते।

दानेन नियमेनापि क्षमा शौचेन वल्लभ।।

अहिंसया सुशांत्या च अस्तेयेनापि वर्तते।

एतैर्दशभिरगैस्तु धर्ममेव सुसूचयेत।।

अर्थात - ब्रह्मचर्य, सत्य, तप, दान, संयम, क्षमा, शौच, अहिंसा, शांति और अस्तेय इन दस अंगों से युक्त होने पर ही धर्म की वृद्धि होती है ।

 

विदुर ने धर्म के आठ अंग बताए हैं -

यज्ञो दानम्अध्य्न तपश च च्त्वार्येतान्य्न्ववेतानि सभ्दि:

दम: सत्यमार्जवमानृशन्सयम च्त्वार्येतान्यंववयंति संत:

अर्थात - यज्ञ, दान, अध्ययन, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ ये आठ धर्म के अंग है.

और इनमें से प्रथम चार अंगों  का आचरण मात्र दिखावे के लिए भी हो सकता है,

किन्तु अन्तिम चार अंगों का आचरण करने वाला व्यक्ती ही धर्माचरण करता है.

विदुरजी की परीभाषा पुर्ण जान पडती है.

अब एक बार इन आठ गुणो को विस्तार से देख ले:

यज्ञ करना - अर्थात समस्त समाज के कल्याण के लिए किया गया कार्य

दान -  अर्थात अपने धन आदि का कुछ हिस्सा समाज कल्याण के लिए सव्यम समर्पित करना

अध्ययन -  अर्थात ज्ञान प्राप्ती

तप -  अर्थात दुसरे के भले के लिए कष्ट सहने को तत्पर रहना

सत्य -  अर्थात जैसा नेत्रो से देखा है वैसा जीव्हा से व्य्क्त करना

दया - अर्थात प्राणी मात्र को कष्ट देने से बचना या यथा सम्भव कम दण्ड देना

क्षमा -  अर्थात अलक्षित अपराध पर दण्ड न देना या कम दण्ड देना

अलोभ -  जो वस्तु अपनी नही है उस अनाधिकृत अधिकार चेष्टा न करना

अब मुझे बताईए, ऐसे कोन कौन से पंथ / धर्म विशेष है जो इन गुणो से दुरी करता है ???

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