अलीगढ़ विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय 1981 में इंदिरा गांधी ने 1920 में कन्वर्ट किया
1968 में उच्चतम-न्यायालय द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के आधार पर
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान नहीं
मुसलमानों को 50 प्रतिशत आरक्षण अवैधानिक
-राकेश उपाध्याय
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का प्रवेश द्वार
क्या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान है? आज चाहे जो कुछ भी हो लेकिन सन् 1981 के पूर्व यह विश्वविद्यालय अपने कानून के मुताबिक कहीं से भी "मुस्लिमों द्वारा मुस्लिमों के लिए स्थापित और संचालित" विश्वविद्यालय नहीं था। वस्तुत: 1920 में केन्द्रीय सरकार के कानून द्वारा इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कालेज सोसायटी और मुस्लिम युनिवर्सिटी फाउण्डेशन कमेटी ने अपने सारे अधिकार, चल-अचल सम्पत्ति सहित नए अधिनियम 1920 के विश्वविद्यालय एक्ट के अन्तर्गत भारत सरकार को सौंप दिए थे। इसे तो अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का जामा सन् 1981 में इंदिरा गांधी ने 1920 के विश्वविद्यालय एक्ट में संशोधन कर पहनाया था। और उसी संशोधन की आड़ में मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह ने गत 19 मई, 2005 को विश्वविद्यालय के 36 परास्नातक विषयों में 50 प्रतिशत स्थान मुसलमानों के लिए आरक्षित किए। जिन विषयों में 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया है उनमें एम.बी.ए., एम.डी.,एम.टेक., एम.सी.ए.,एम.एड. जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम सम्मिलित हैं। विश्वविद्यालय अकादमिक परिषद ने गत 28 अप्रैल को यह आरक्षण विश्वविद्यालय में न पढ़ने वाले बाहर के स्नातक मुस्लिमों के लिए एक प्रस्ताव द्वारा पारित किया था। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस नई आरक्षण नीति में उपरोक्त 50 प्रतिशत आरक्षण के अतिरिक्त 20 प्रतिशत सीटें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के स्नातकों के लिए एवं 5 प्रतिशत सीटें कुलपति के विवेकाधीन कोटे हेतु, कर्मचारी-अध्यापक एवं पूर्व छात्रों के बच्चों के लिए सुरक्षित रखी गयी हैं। स्पष्टत: 75 प्रतिशत सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित कर दी गयी हैं।
संसद और उच्चतम न्यायालय-कौन सही, कौन गलत
अलीगढ़ विश्वविद्यालय एक्ट-1920 में सन् 1981 में इन्दिरा सरकार द्वारा किए गए संशोधन ने उच्चतम न्यायालय के आदेश को भी ताक पर रख दिया
सर सैयद अहमद खां ने क्या सचमुच अलीगढ़
मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की थी?
वस्तुत : यह आरक्षण भी केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह की पहल पर दिया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्री ने ही विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद् को आरक्षण का यह प्रस्ताव मंत्रालय के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए कहा था। दिनांक 25 फरवरी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुनील कुमार विश्वविद्यालय को लिखे अपने पत्र में कहते हैं, "अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक्ट 1981 (संशोधित) का अधिनियम 5 (सी) विश्वविद्यालय को भारत के मुसलमानों के शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उन्नयन को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने के लिए निर्देशित करता है। सरकार मानती है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक पांथिक अल्पसंख्यक संस्थान है जो कि भारत के संविधान की धारा 30 (1) के द्वारा स्थापित एवं संचालित है। इसी के अनुसार मुझे यह भी कहना है कि विश्वविद्यालय की एमडी/एमएस/परास्नातक सीटों में उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा भारतीय मुसलमानों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान पर भी मंत्रालय को कोई आपत्ति नहीं है।" मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इस पत्र के बाद शीघ्र ही 28 अप्रैल को विश्वविद्यालय अकादमिक परिषद् की बैठक में आरक्षण का मसौदा प्रस्तुत किया गया और दिनांक 2 मई को इस प्रस्ताव को विश्वविद्यालय कार्यकारिणी द्वारा अनुमोदित कर अंतिम स्वीकृति के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय भेज दिया गया। वैसे इसके पूर्व में भी कई बार विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद् के समक्ष मुसलमान विद्यार्थियों के लिए 50 प्रतिशत सीटों के आरक्षण का प्रस्ताव पेश किया जा चुका है लेकिन बहुमत के विरोध के कारण यह प्रस्ताव परिषद् के द्वारा सदैव निरस्त होता रहा है। लेकिन इस बार कुलपति प्रो. नफीस अहमद के कार्यकाल में मानो जादू हो गया।
कुछेक वामपंथी रुझान वाले प्रो. इरफान हबीब जैसे लोगों को छोड़ दें तो किसी ने भी इस प्रस्ताव का विरोध नहीं किया। आरक्षण की वैधानिकता के सवाल पर तो बहस अब शुरू हो चुकी है। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि जो विश्वविद्यालय कभी अल्पसंख्यक रहा ही नहीं, वहां यह सब आखिर किस आधार पर हो रहा है अतएव अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान न होने की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर एक नजर डालना यहां जरूरी होगा।
मई सन् 1873 में अलीगढ़ में मुसलमानों में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के लिए सर सैयद अहमद खां ने एक प्राइमरी पाठशाला की स्थापना की थी। नाम था "मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल" जो आगे चलकर 1876 में एक हाईस्कूल के रूप में परिवर्तित हुआ। सन् 1877 में तत्कालीन वायसराय लार्ड लिटन ने इसे एक कालेज के रूप में चलाने के लिए नए भवन का शिलान्यास किया। कालांतर में सर सैयद अहमद खां द्वारा स्थापित इस कालेज को विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित करने की इच्छा को देखते हुए सन् 1911 से 1920 के मुस्लिम प्रतिनिधियों एवं भारत सरकार के मध्य कई दौर की वार्ता हुई। भारत सरकार ने तब सम्प्रदाय विशेष की जगह अलीगढ़ विश्वविद्यालय को वर्ण, जाति, सम्प्रदाय, भाषा आदि भेदों से परे रखकर सभी भारतीयों के अध्ययन के लिए खोलने का निश्चय किया और बाकायदा विश्वविद्यालय एक्ट में इस सन्दर्भ में स्पष्ट नियम बनाए गए। (ए.एम.यू.एक्ट-1920, धारा 8)
इसके पूर्व जब मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कालेज के प्रबंधन ने अपनी सम्पूर्ण चल-अचल सम्पत्ति और संस्था के प्रबंधन के अधिकार भारत सरकार को बिना शर्त सौंपे, तब जाकर भारत सरकार ने 1920 में संसद में कानून पारित कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना का रास्ता साफ किया। केवल इस्लामिक अध्ययन के कुछ विशेष पाठ्यक्रमों को अवश्य स्वीकृति दी गयी थी, शेष इसका पांथिक स्वरूप कुछ बिन्दुओं को छोड़कर पूर्णरुपेण समाप्त कर दिया गया।
एक्ट की धारा 13 के अनुसार विश्वविद्यालय के "लार्ड रेक्टर के सर्वोच्च पद पर गवर्नर जनरल को पदेन नियुक्ति देने को स्वीकृति दी गई। इसके साथ-साथ विश्वविद्यालय के कामकाज पर नजर रखने के लिए "विजिटिंग बोर्ड" का भी गठन किया गया। लार्ड रेक्टर और विजिटिंग बोर्ड के सदस्य मुसलमान ही होंगे, ऐसा उल्लेख पूरे एक्ट में कहीं भी नहीं था। विश्वविद्यालय कोर्ट जो विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण निर्णयों को स्वीकृति देने वाला निकाय था, उसे भी गर्वनर जनरल और विजिटिंग बोर्ड के निर्देशों को मानना अनिवार्य था, कोर्ट के सभी सदस्य परम्परा से केवल मुस्लिम होते थे और जिसे कानूनी दर्जा भी प्राप्त था, इसे सन् 1951 में एक्ट में संशोधन कर समाप्त कर दिया गया और विश्वविद्यालय कोर्ट में बतौर सदस्य गैर मुस्लिम भी चुने जाने लगे।
1965 में मोहम्मद करीम छागला केन्द्रीय शिक्षा मंत्री थे। इस बीच विश्वविद्यालय परिसर के निर्णयों में कट्टरपंथी मुस्लिम तत्वों का दखल काफी बढ़ गया था। श्री छागला ने विश्वविद्यालय को कट्टरपंथी मुसलमानों के शिकंजे से निकालने के लिए पेरिस के तत्कालीन भारतीय राजदूत नवाब अली यावर जंग की विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर नियुक्ति की। इस निर्णय से बौखलाए कट्टरपंथी तत्वों ने एक दिन विश्वविद्यालय कोर्ट की बैठक के समय कुलपति नवाब अली यावर जंग पर कातिलाना हमला कर दिया। वस्तुत: नवाब अली यावर जंग एक उदार मुस्लिम थे और उन्होंने विश्वविद्यालय में मजहबी रीति-रिवाजों को बदलने का पूरा मन बना लिया था। श्री छागला को तब यह रपट मिली थी कि कोर्ट के कुछ कट्टरपंथी सदस्यों के षड्यंत्र और शह पर यह हमला किया गया है। अत: मोहम्मद करीम छागला ने 1965 में पुन: ए.एम.यू.एक्ट में संशोधन कर कोर्ट को भंग कर दिया। तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री छागला का स्पष्ट मानना था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है न कि इसकी स्थापना केवल मुस्लिमों के लिए की गई है। (देखिए बाक्स)।
सन् 65 में विश्वविद्यालय कोर्ट में कुलपति पर हमले की घटना के चलते पूरे देश में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बढ़ते कट्टरवाद के विरुद्ध जो माहौल बना, उसी के चलते सन् 1965 में ही संसद ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक्ट 1920 में संशोधन कर विश्वविद्यालय के संचालन की सम्पूर्ण शक्ति कोर्ट और अकादमिक परिषद् से छीनकर "विजिटर" अर्थात राष्ट्रपति में निहित कर दी।
इस पर कुछ क्रुद्ध मुसलमानों ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रशासन का अधिकार मुसलमानों से छीनकर संविधान का उल्लंघन कर रही है। कई अन्य लोगों ने, जिनमें एस. अजीज बाशा, मोहम्मद यासीन नूरी, जुल्फीकारुल्ला, डा. मोहम्मद ताजुद्दीन कुरेशी, मोहम्मद इदरीस ने सन् 1966 में उच्चतम न्यायालय में 1951 और 1965 के संशोधनों के विरुद्ध याचिका संख्या 84, 174, 188, 241 और 242 दाखिल की। इन सभी याचिकाओं को मुख्य न्यायाधीश के. एन.वानछू की अध्यक्षता में न्यायाधीश आर.एस.बछावत, न्यायाधीश वी. रामास्वामी, न्यायाधीश जी.के. मित्तर और न्यायाधीश के. एस. हेगड़े की खण्डपीठ ने सुना। इन विद्वान न्यायाधीशों ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए कहा (ए.आई.आर. 1968, उच्चतम न्यायालय 662 (ध्-55 ड़-134)) कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय संविधान की धारा 30(1) के अन्तर्गत नहीं आती। न तो यह विश्वविद्यालय मुस्लिमों द्वारा स्थापित है और न ही इसके प्रशासन पर उनका अधिकार है। उच्चतम न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि 1951 और 1965 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक्ट में कि ए गए संशोधन कहीं से भी धारा 30(1) का उल्लंघन नहीं करते हैं। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अस्तित्व केन्द्रीय कानून के द्वारा बनाए गए विश्वविद्यालय एक्ट-1920 के कारण आया है अतएव धारा 30(1) के उल्लंघन का सवाल ही पैदा नहीं होता। यह सही है कि इसके निर्माण में मुसलमानों ने प्रयत्न किया, पर इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि इसे अल्पसंख्यक मुस्लिमों द्वारा स्थापित माना जाए।
अब इसे मुस्लिम तुष्टीकरण नहीं तो और क्या कहेंगे कि सन् 1981 में इन्दिरा सरकार ने उच्चतम न्यायालय की उपरोक्त व्याख्या को धता बताते हुए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक्ट -1920 में संशोधन करते हुए वह सब कुछ लिख दिया जिसका उल्लेख संयुक्त सचिव सुनाल कुमार अपने पत्र में कर चुके हैं यानि संशोधन के द्वारा विश्वविद्यालय को संविधान की धारा (30)1 के अन्तर्गत "मुस्लिमों द्वारा स्थापित और संचालित" मान लिया गया।
1981 में जो संशोधन किए गए, उसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के चरित्र को परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन् 1981 के संशोधन द्वारा 1920 के ए.एम.यू.एक्ट में "विश्वविद्यालय मुस्लिमों द्वारा स्थापित" शब्द जोड़ा गया। विश्वविद्यालय कोर्ट को बहाल किया गया, यही नहीं तो कोर्ट की सदस्यता के नियम भी बदल दिए गए। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, कुलपति, उप-कुलपति की चयन प्रक्रिया भी बदल दी गयी। कुल मिलाकर विश्वविद्यालय का स्वामित्व पूरी तरह से सरकार के हाथों से निकलकर मुस्लिम प्रबंधन के पास चला गया।
लेकिन इतना होने के बाद भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मुस्लिम छात्रों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण को जायज नहीं ठहराया जा सकता। ए.एम.यू.एक्ट. 1981 (संशोधित) के अनुसार ही इसका परीक्षण करें तो भी इस एक्ट की धारा 8 विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के प्रवेश और अध्यापन के कार्य में जाति, सम्प्रदाय, लिंग, धर्म, वंश के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को निषिद्ध करती है।
सन् 1981 में किया गया संशोधन अन्य भी कई मामलों में अन्तर्विरोधों का शिकार है। एक्ट की धारा 2 में विश्वविद्यालय की जो परिभाषा दी गयी है, वह 1920 में विश्वविद्यालय एक्ट की घोर अवमानना है। और तो और इस संशोधन ने 1968के उच्चतम-न्यायालय के आदेशों की भी धज्जियां उड़ा दी हैं। विश्वविद्यालय की परिभाषा देते हुए धारा 2 के (1) में कहा गया है, "University" means the educational institution of their choice established by the Muslims of India, which originated as the Muhammadan Anglo-Oriental College, Aligarh and which was Subsequently incorporated as the Aligarh Muslim University. यानी विश्वविद्यालय को मुसलमानों द्वारा स्थापित मान लिया गया लेकिन इसके विपरीत 1968 में उच्चतम न्यायालय ने जो निर्णय दिया उसे भी देखना समीचीन होगा। उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय की स्थापना के सन्दर्भ में मुसमलानों के दावों को नकारते हुए कहा था कि, Muslim minority as such could not claim to be fundatio perficiens for that right would only be in the donors and no others.
अंत में उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक संस्थान न होने के कारणों का विश्लेषण करते हुए कहा कि "We are therefore of opinion that the Aligarh University was nither established nor administered by the Muslim minority and therefore there is no question of any amendment to the 1920-Act being unconstitutional under article 30(1) for that article does not apply at all to the Aligarh University" यानी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मुसलमानों द्वारा स्थापित ही नहीं है और न ही इसके संचालन में ही मुसलमानों का कोई अधिकार है अत: 1920 एक्ट में जो संशोधन 1951 व 1965 में किए गए वे कहीं से भी असंवैधानिक नहीं है।
लेकिन देश का दुर्भाग्य, 1981 में इंदिरा सरकार ने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थों के लिए न केवल उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की खुली अवहेलना की वरन् 1981 में संशोधन कर 1920 के विश्वविद्यालय एक्ट के सम्पूर्ण ढांचे में ही आमूल परिवर्तन कर दिया। अब जबकि 1981 का संशोधन ही संविधान की मूल भावना पर कुठाराघात है तो फिर 50 प्रतिशत आरक्षण को किस प्रकार से जायज ठहराया जा सकता है।
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