शिक्षक दिवस कविता
जब घबरा जाता था
कठिन शब्दों की इमला से
आँखों से बहने लगते थे आँसू
तब कोई था
जो हौसला बढ़ाता था
लिखना सिखाता था
जब लिख कर दिखाता था
किसी पन्ने पर
कल्पना से बातें करती
कोई कविता
तब कोई था
जो सहेजना सिखाता था
जब पढ़ता था
फर्राटेदार संस्कृत
क्लास रूम रीडिंग के समय
तब कोई था
जो सबसे तालियाँ बजवाता था
जब ज़रूरत थी
कॉमर्स की
महंगी किताबों की
तब कोई था
जो निश्चिंत रहने को कहता था
जब दिक्कत आती थी
अङ्ग्रेज़ी बोलने में
नौकरी की जगह पर
तब कोई था
जो झिझक मिटाता था
वो कोई था
वो अब भी है
मेरे दिल के भीतर
बीते दिनों की यादों के साथ
इस सफर में
न कभी भूला हूँ
न कभी भूलूँगा
अपने शिक्षकों को।
Comments
Post a Comment