शिया और सुन्नी

सुन्नी सऊ‚दी और शिया इराक के बीच खींचतान, ईरान की कूटनीतिबढ़ती शिया ताकत से भयभीत अरब राष्ट्र

- मुजफ्फर हुसैन

इस्लाम की छतरी तले मुस्लिम राष्ट्र कितनी ही एकता का स्वर बुलंद करें लेकिन दुनिया जानती है कि इन मुस्लिम देशों में अनेक प्रकार की भिन्नताएं हैं। दुनिया में जितने भी मुस्लिम राष्ट्र हैं उनमें ईरान को छोड़कर सभी सुन्नी पंथी हैं, ईरान एकमात्र शिया देश है। जहां तक इराक की जनसंख्या का सवाल है वहां 55 प्रतिशत शिया हैं लेकिन फिर भी वह सुन्नी देश कहलाता है। वहां की सरकार पर हमेशा से सुन्नी प्रभावी रहे हैं। इराक के 45 प्रतिशत सुन्नियों से वहां के शियाओं का कभी संघर्ष नहीं रहा। उन्होंने इराक को शिया देश बनाने की कोशिश भी नहीं की। दिलचस्प बात यह है कि इमाम खुमैनी के समय में 1978 से 80 तक इराक और ईरान के बीच भीषण युद्ध होता रहा जिसका नेतृत्व सद्दाम हुसैन करते रहे। अंतत: ईरान के शासकों ने एकपक्षीय युद्धविराम की घोषणा करके इराक से हार स्वीकार कर ली। संक्षेप में कहना हो तो पंथ के आधार पर इराक की राष्ट्रीयता में कोई बदलाव नहीं आया। बाद के दिनों में ऐसे समीकरण बदले कि जिस अमरीका की सहायता से इराक जीतता रहा उसी इराक को अमरीका ने धर दबोचा। अमरीका के संबंध आज भी ईरान से ठीक नहीं हैं लेकिन इराक की जनता को दबाने और सद्दाम के समर्थकों का सफाया करने के लिए ईरान इराक के शियाओं को समर्थन दे रहा है।

इराक में इस समय अमरीका की छत्रछाया में जो सरकार चल रही है वह भी शियाबहुल है। पिछले 1400 वर्ष के इतिहास में सुन्नियों ने कभी नहीं चाहा कि शिया मजबूत बनें लेकिन इस समय चक्र इस प्रकार से गतिमान है कि शिया शक्तिशाली बन रहे हैं और सुन्नी बहुमत में होने के बावजूद कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। इसलिए दोनों पंथों के बीच शीत युद्ध चल रहा है। इराक में शिया ताकतवर बनते जा रहे हैं इसलिए सुन्नी अरब को यह चिंता सताने लगी है कि कहीं ऐसा न हो जाए कि इराक शियाबहुल हो जाए। अमरीका जिस तरह से अरबों को झुकाने के लिए इस्रायल को समर्थन देता है उसी प्रकार अब वह सुन्नी अरबों को कमजोर करने के लिए शिया पंथ की भी हिमायत करता दिखाई पड़ता है। ऊ‚पर से देखा जाए तो ईरान अमरीका का घोर विरोधी है, परमाणु मामले में दोनों के बीच तीव्र विरोध है। उर्दू तथा अरबी मीडिया का तो यहां तक कहना है कि अमरीका बहुत जल्द ईरान पर हमला करने वाला है। इसके बावजूद सुन्नी देश अमरीका को शिया समर्थक मानते हैं।

इराक में शियाओं की बढ़ती ताकत देखकर अरब राष्ट्रों ने इराक से दूरी बना ली है। अरब देशों का कहना है कि इराक पहले तो अमरीका से लड़ा लेकिन सद्दाम के पतन के बाद उसे अब वहां के शियाओं से लड़ना पड़ रहा है। सऊ‚दी अरब हो अथवा जार्डन, किसी ने भी इराक से दूतावास स्तर के संबंध नहीं रखे हैं। जिस बगदाद में कभी अरबों की तूती बोलती थी, आज उनके दूतावास खाली पड़े हैं। स्थिति यह है कि इराक की सरकार इन देशों से न तो कोई शिकायत कर सकती है और न ही विरोध। इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि वहां चल रहे दो पंथों के संघर्ष को सऊ‚दी और जार्डन स्वीकार नहीं कर सकते। सन् 2005 में जब मिस्र के राजदूत की हत्या हो गई तो समस्त सुन्नी देश सांसत में पड़ गए। शिया लड़ाकुओं का इतना बोलबाला है कि वहां की सरकार दूतावास के कर्मचारियों की कोई "गारंटी" नहीं ले सकती। पिछले दिनों कुवैत की अरब परिषद में भी यही मामला चर्चित रहा।

1978-79 के युद्ध में सभी अरब देशों ने ईरान के विरुद्ध इराक को हर तरह की मदद केवल इस कारण से की थी कि कहीं इस्लामी जगत में ईरान का दबदबा अन्य मुस्लिम राष्ट्रों पर न हो जाए। सुन्नी राष्ट्र इराक को इसलिए भी समर्थन दे रहे थे क्योंकि वे जानते थे कि एक दिन इराक परमाणु ताकत बन जाएगा। जब इस्रायल ने बगदाद में स्थित परमाणु ठिकाने पर हमला कर उसे तहस-नहस कर दिया, उस समय सुन्नी जगत को लगा कि ईरान और अमरीका दोनों इस साजिश के पीछे हैं। बगदाद पर अब तक किसी की भी हुकूमत रही हो लेकिन वह सुन्नी विरोधी नहीं रहा। लेकिन अब अरब राष्ट्रों का मानना है कि बगदाद का पतन सुन्नी ताकत का पतन बन सकता है। सद्दाम के पतन के पश्चात इराक अब अरब देशों के "क्लब" का सदस्य नहीं रहा, ऐसा जार्डन के शाह अब्दुल्ला और मिस्र के हसनी मुबारक का मानना है। इस परिवर्तन ने वहां विचित्र स्थिति पैदा कर दी है। क्योंकि इराक में शिया नेतृत्व है इसलिए अरब जगत इराक में शिया साझोदारी तो स्वीकार कर सकता है लेकिन उनका दबदबा हरगिज नहीं। इराक के लड़ाके अब आतंकवादी बनते जा रहे हैं। इस कारण सऊ‚दी अरब बहुत भयभीत है। वहां का शाही परिवार इसको अपने लिए खतरा मानता है। इससे पहले सऊ‚दी की कूटनीति यह रही कि शिया प्रभाव उनसे दूर रहे, लेकिन यदि इराक में हालात नहीं बदलते हैं तो फिर सऊ‚दी इसे चुपचाप नहीं देख सकता।

सन 2007 से सऊ‚दी सरकार ने इराक के प्रधानमंत्री नूरी अलमालिकी के साथ अपने संबंध समाप्त कर लिए हैं। उनका कहना है कि नूरी शिया सम्प्रदाय को बढ़ावा दे रहे हैं। यही नहीं इराक में सुन्नियों का कत्लेआम हो रहा है और वे चुप बैठे हुए हैं। इराक में तीन साल से मार काट चल रही है। कोई दिन नहीं जाता जब सुन्नियों की लाशें न गिरें। यदि ऐसा न होता तो इराक से अमरीका सेना चली जाती। अब तो स्थिति उलट गई है। अमरीकी सेना वापस इराक आ रही है और उसमें रोजाना वृद्धि हो रही है। लेकिन कुछ सुन्नी नेताओं का कहना है कि अमरीकी सेना का आना और रहना उनके पक्ष में है। इससे शियाओं का प्रभुत्व नहीं बढ़ेगा।

यह मामला केवल सऊ‚दी अरब का नहीं है बल्कि अरब लीग के 19 राष्ट्र इस मामले में एक मत हैं। सभी की चिंता यह है कि सदियों से इराक सुन्नी देश रहा है, यदि अब उसकी पहचान से छेड़छाड़ की जाती है तो सभी पर उसका प्रभाव पड़ेगा। इस मामले में सबसे कड़ी प्रतिक्रिया सऊ‚दी अरब व्यक्त करता है। सऊ‚दी का कहना है कि नूरी सरकार का पहला दायित्व वहां के सुन्नियों को सुरक्षा देना है। इराक में सुन्नियों की करोड़ों रुपए की सम्पत्ति है। वहां के सुन्नी अपने पड़ोसी देशों से सहायता प्राप्त करने की गुहार लगा रहे हैं।

अमरीका यह भी चाहता है कि पड़ोसी देश इराक पर जो पिछला ऋण है, वह माफ कर दें। सद्दाम के समय से चला आ रहा कर्जा एक बार यदि माफ कर दिया जाता है तो वर्तमान सरकार में स्थायित्व आ जाएगा। लेकिन कोई भी पड़ोसी देश ऐसा करने के लिए तैयार नहीं है। नूरी सरकार के पास पैसा नहीं है। ऐसी स्थिति में उसका सारा दारोमदार अमरीका पर है। अमरीका इराक की पुर्नरचना में करोड़ों डालर लगा रहा है। वास्तविकता यह है कि अमरीका ही उसका सारा भार उठा रहा है। इसके बदले में वह तेल प्राप्त करता है, लेकिन अमरीका का मानना है कि इतने दामों में तो वह किसी भी अन्य देश से सस्ता तेल प्राप्त कर लेगा। अमरीका ने अपने दुश्मन सद्दाम को केवल इसलिए मारा क्योंकि वह तेल का मूल्य डालर में न लेकर यूरो में लेना चाहता था। अमरीका ने सद्दाम को हटाकर अपना डालर तो बचा लिया लेकिन अब उसे इराक में अपनी सेना पर जो खर्च करना पड़ रहा है वह उससे अधिक भारी है। अमरीका की सेना जिस देश में जाती है वहीं से उसका खर्च प्राप्त करती है, लेकिन इराक में ऐसा नहीं हुआ है। उसे यह खर्च अपनी जेब से भरना पड़ रहा है। इसलिए अमरीका चाहता है कि इराक में शीघ्र शांति स्थापित हो जाए और वह वहां से निकल जाए। सद्दाम को फांसी दे देने के बाद भी उसके समर्थकों का जोर अभी तक कम नहीं हुआ है। यह भी संभव है कि वे नूरी का तख्ता पलट दें और बगदाद पर कब्जा कर लें। यदि ऐसा होता है तो अमरीका अपने दूरगामी लक्ष्य में सफल नहीं होगा। यानी उसका कब्जा इराक के तेल भंडार पर नहीं होगा। इस समय तो इराक के पास केवल उसका तेल ही एकमात्र आय का स्रोत है। इराक पर कुल 80 करोड़ डालर का ऋण हैं। इसमें आधे से अधिक धनराशि खाड़ी के देशों की है। यदि नूरी सरकार अपने तेल की आय में से उक्त ऋण उतारने का प्रयास करे तो भी आज का कमजोर इराक खड़ा नहीं हो सकता। इराक के पड़ोसी सुन्नी देश उसे नया ऋण तभी देंगे जब सरकार स्पष्ट रूप से सुन्नियों के हाथ में आए।

ईरान के प्रभुत्व के कारण इराकी हुकूमत दबाव में है। अलमहदी आर्मी के प्रमुख मुकतदा राष्ट्रपति को चाहते हुए भी इराकी हुकूमत कुछ नहीं कह सकती है। यही कारण है कि शिया लड़ाकों की गतिविधियां इराकी हुकूमत की नीतियों पर पानी फेर रही है। सवाल यह है कि नूरी अलमालिकी के सामने रास्ता क्या है? यदि मुकतदा राष्ट्रपति के विरुद्ध कोई कार्यवाही करती है तो सरकार डांवाडोल हो जाती है। देश में शिया आतंकवादियों पर कोई काबू नहीं रहेगा। ऐसा करने से ईरान का हस्तक्षेप और भी बढ़ जाएगा। प्रारंभ में नूरी ने बीच का मार्ग अपनाया लेकिन इस समय वे जहां खड़े हैं वह मार्ग सुन्नियों के कत्लेआम का है वरना वे सरकार से अलग हो जाएं। क्योंकि बसरा में अलमहदी आर्मी के विरुद्ध भीषण युद्ध के बाद भी हुकूमत अलसदर मुकतदा का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकी। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सरकार पर ईरान का भारी प्रभाव है। इसलिए नूरी सरकार मौन है। जब तक यह माहौल रहेगा कोई भी सुन्नी देश इराक के समर्थन में आकर खड़ा नहीं होगा।

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