हिंदी क्यूँ ?
"डॉ.गेनादी श्लोम्पेर फिलहालइज़रायल के तेल-अवीव विश्व विद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रमुख है. इसके पहले वे रूस की राजधानी मास्को और उसके पहले अपनी जन्मभूमि उजबेकिस्तान में शिक्षक के रूप में लोगों को हिन्दी से जोडते रहे है.पिछले पच्चीस वर्षों में लगभग एक हज़ार लोगों को हिन्दी से जोड़ चुके डॉ.श्लोम्पेर ने किसी अंतर्प्रेरणा के तहत कॉलेज में हिंदी को चुना था और अब वे नए-नए रचनात्मक प्रयोग कर इज़राइल के युवाओं को हिन्दी से जोड रहे है. प्रस्तुत है डॉ.गेनादी श्लोम्पेर द्वारा हिन्दी होम पेज के लिए लिखे गए इस लेख का पहला भाग"
हां, विश्व में ऐसे लोग बहुत बड़ी संख्या में है जो भारत की समृद्ध संस्कृति, उसके इतिहास और धर्म-दर्शन से सम्मोहित हैं और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरे झुकाव के चलते वे हिन्दी के साथ जुड जाते है लेकिन हिन्दी से मेरे रिश्ते की शुरुआत इस तरह नहीं हुई. हिन्दी से मेरे प्रेम की कहानी एकदम अलग है. जिस दिन मैंने हिन्दी सीखने का निर्णय लिया था,उस दिन भारत के बारे में मेरी जानकारी बहुत सीमित थी. यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मेरी जानकारी शून्य से थोड़ी सी ही अधिक थी. यही नहीं, हिन्दी भाषा सीखकर अध्यापक बनने की मेरी कोई योजना नहीं थी.
उस समय मुझे सिर्फ वह प्रक्रिया देखने में बहुत रुचि हो रही थी कि एक विचार भिन्न भिन्न भाषाओं में किस तरह और क्यों अभिव्यक्ति के विभिन्न रूप धारण कर लेता है. इस तरह हिन्दी सीखने का कारण शुरू-शुरू में एक संयोग ही था, एक ऐसा संयोग जिसे शायद प्रकृति ने तय किया था मैंने नहीं. मतलब मैंने हिन्दी या भारत से प्रेम के चलते हिन्दी को नहीं चुना था बल्कि प्रकृति ने मेरे लिए हिन्दी को चुना था.
"ये लेख बात लिखते समय मेरे मन में एक बात और आ रही है. अंग्रेज़ी, फ्रेंच या स्पेनिश भाषा के अध्यापकों से शायद ही कभी ये पूछा जाता होगा कि इन भाषाओं से आपका लगाव कब और कैसे हुआ? पर शायद ये प्रश्न हिन्दी के अध्यापको से अक्सर पूछा जाता है.-पढ़िए हिंदी के प्रेमी और विद्वान डॉ.गेनादी श्लोम्पेर द्वारा लिखे गए लेख का दूसरा भाग"
मगर ये प्रश्न स्थिति का एक ही पक्ष बताता है, अब इस स्थिति का दूसरा पक्ष देखिये. मैं जहां भी रहा (और मुझे अपने जीवन में तीन देशों का नागरिक बनना नसीब हुआ है, पहले उज़बेकिस्तान, फिर रूस और अब इज़रायल) हर जगह हिन्दी ही मेरी कमाई का एकमात्र माध्यम बनी रही.
ताशकंद विश्वविद्यालय से हिन्दी/उर्दू में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के बाद अपने सपने को साकार करते हुए मै ताशकंद रेडियो के उर्दू विभाग में काम करने लगा.यहाँ मै अनुवादक के रूप में काम करता था.ये ज़िम्मेदारी मैंने चार साल निभाई. लेकिन एक कम्यूनिस्ट देश के रेडियो पर रोज़ झूठी बातों का अनुवाद करते-करते मैं थक गया था. वहाँ कुछ ऐसा वातावरण था जिससे मेरा दम घुटता था. आखिरकार मैंने उसे छोड़ दिया और इसके बाद एक स्कूल में अध्यापक के रूप में काम करने लगा.बस यही वो कदम था जिसने मेरी ज़िंदगी को बदल दिया.स्कूल में काम शुरू करते ही मैं समझ गया कि मेरा जीवन का लक्ष्य भाषा का अध्यापन करना है.मेरे सामने अब मेरे जीवन का लक्ष्य एकदम साफ़ हो गया था. कुछ साल तक इस स्कूल में पढाने के बाद मै मॉस्को पहुँच गया और यहाँ हिन्दी पढ़ाने लगा और तब से लेकर आज तक यानी पिछले लगभग २५ सालों से मै हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन में लगा हुआ हूँ.
भाषा और संस्कृति एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं. भाषा,संस्कृति के जीवित रहने का माध्यम भी है और उसका दर्पण भी. इसलिये जो लोग भारत की संस्कृति पर शोध कर रहे हों, उनके लिये भारतीय भाषाओं की खासकर हिन्दी की जानकारी अनिवार्य है.ठीक ऐसा ही भाषा के क्षेत्र में भी है. भारत की संस्कृति जाने बिना हिन्दी भाषा को न तो उचित ढंग से समझा जा सकता है और ना ही पढ़ाया जा सकता है. अपना कार्य सुचारु रूप से निभाने के लिये भाषा के अध्यापक को उस भाषा से जुड़े देश की संस्कृति, इतिहास, परम्पराएं और आधुनिक जीवन का व्यापक ज्ञान होना चाहिये. हिन्दी को समझने और समझाने के लिए मैंने भारत को समझने की कोशिश शुरू की और इस मोड पर आकर शुरू हुआ हिन्दी और भारत के प्रति लगाव, अपनेपन और आत्मीयता का दौर..
"इज़राइल के युवाओं को हिन्दी से जोडने के लिए के हिन्दी और हिब्रू के बीच संवाद का एक पुल बनाना ज़रुरी था. मैंने हिब्रू भाषा में पुस्तकें लिखकर दोनों भाषाओं के बीच एक ऐसा ही पुल बनाने की कोशिश की.१५ साल पहले जब मैंने इज़रायल में हिन्दी का अध्यापन शुरू किया था. तब पूरे इज़राइल में, मैं हिन्दी का अकेला अध्यापक था. मुझे इस बात की खुशी है कि आज इज़रायल के तीन विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है.यहाँ पढ़िए तेल अवीव विश्वविद्यालय के हिन्दी प्रमुख डा.गेनादी श्लोम्पर के लेख का तीसरा भाग "
इसी खिंचाव ने मुझे हिन्दी पढ़ाने के लिये हिब्रू भाषा में पाठ्य-पुस्तकें लिखने के लिये प्रेरित किया.इज़राइल के युवाओं को हिन्दी से जोडने के लिए के हिन्दी और हिब्रू के बीच संवाद का एक पुल बनाना ज़रुरी था. मैंने हिब्रू भाषा में पुस्तकें लिखकर दोनों भाषाओं के बीच एक ऐसा ही पुल बनाने की कोशिश की. यहाँ के युवाओं में हिन्दी और भारत के प्रति रुचि और जिज्ञासा जागृत करने के लिए मैंने हिब्रू भाषा में हिन्दी सीखाने के लिए पुस्तकें लिखी. लगातार प्रयास करके मैंने तीन साल के कोर्स के लिये ज़रूरी पुस्तकें तैयार की.
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