सबसे बड़ा किसान रहेगा

सबसे बड़ा किसान रहेगा...

कोई कितना भी बढ़ जाए, सबसे बड़ा किसान रहेगा... जिसके धानों के खेतों में, स्वर्णिम बालें लहर रही हैं,

जिसके खलिहानों में, हीरा-मोती-मणियाँ छहर रही हैं, उसकी छाती पर बैठे वे, साहूकार कहाँ समा गए ?

जिसमें शिव की छटा देखकर, धरती पर कैलाश आ गए, उसके चरणों के नीचे ही, पशुबल का अभिमान रहेगा...

कोई कितना भी बढ़ जाए, सबसे बड़ा किसान रहेगा... शोषण की जितनी पूँजी से, बनते पूँजीपति मनमाने,

उतने से सौ गुना खेत से, चिड़ियाँ चुग जाती हैं दानें, ले जाते *मजूर* भी हँसकर, अपनी बाँट-बाँट मजदूरी,

*अभ्यागत* है कौन कि आखिर, जिसकी उसने *साध* न पूरी ? कर-लगान, फिर ब्याज चुकाकर, हँसता खड़ा किसान रहेगा...

कोई कितना भी बढ़ जाए, सबसे बड़ा किसान रहेगा... तुम भी तो रोटी खाते हो, बोलो अगर किसान न होता ?

यह कागज का नोट... देश के भूखों का भगवान न होता... तब तुम जाते दौड़ मेड़ पर, माटी में सिर-पैर खपाने,

पानी-पत्थर-आग सहन कर, तुम भी पा जाते दो दानें, इसीलिए तो इस *तपसी* का, सदा अमर श्रमदान रहेगा...

कोई कितना भी बढ़ जाए, सबसे बड़ा किसान रहेगा... बड़े-बड़े नेता भी देखो, उसका लेके नाम जा रहे,

*हलधर* और *अन्नदाता* का, करते उसे प्रणाम जा रहे, युग-युग की संस्कृति का *सोता*, उसके गीतों में बहता है

दुनिया के श्रमवीरों का बल, उसके साथ डटा रहता है, *भंउरा-कजरे* की जोड़ी पर, उसका अमर निशान रहेगा...

कोई कितना भी बढ़ जाए, सबसे बड़ा किसान रहेगा... अब तो उसकी पंचायत है, जब पंचायतराज आ गया,

बापू के सपनों का *सैंतुक*, सचमुच नया समाज आ गया, फिर भी वह न किसी पर हावी, अपनी माटी नहीं छोड़ता,

*आल्हा-साखी* छेड़-छेड़ कर, अब भी टूटे तार जोड़ता, शस्य-श्यामला के मोर्चे पर, सुख से खड़ा किसान रहेगा...

कोई कितना भी बढ़ जाए, सबसे बड़ा किसान रहेगा... 


-रामनारायण सुकुल ‘संदेशी’

15 अगस्त, 1953, फर्रुखाबाद

शब्द सहायता -

1. मजूर = मजदूर, 2. अभ्यागत = मेहमान, 3. साध = इच्छा, 4. तपसी = तपस्वी, तप करने वाला, 5. हलधर और अन्नदाता = तत्कालीन चुनावी निशान, 6. सोता = स्रोत, 7. भँउरा-कजरे = दो बैलों के नाम, 8. सैंतुक = साकार, मूर्तिमान, 9.आल्हा = बुंदेली
लोक गान

टिप्पणी -
शहीद लाल पद्मधर की टीम के स्वातंत्र्य सैनिक एवं देश को ईमानदार प्रशासनिक सेवा देने वाले दिवंगत बुंदेली कवि श्री ‘संदेशी’ के काव्य संकलन *‘गाँव की रागिनी’** *से यह कविता साभार उद्धृत है। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन और राहुल सांकृत्यायन जैसे उद्भट विद्वानों ने भी इस संकलन की प्रशंसा की थी।

प्रस्तुति- सुशील अवस्थी ‘आदित्य’

संपर्क- 09457929212

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