Posts

Showing posts from September, 2015

भारत के इतिहास से छेड़छाड़ 1

Image
भारत के एक महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस जी ने एक प्रयोग किया और साबित किया की पेड़ पौधों में भी अन्य जीवों की तरह प्राण व् संवेदना होती है. उन्होंने 1 दिन 2 पौधे रोपे. 1 को पुचकारा, प्रेम किया, खूब फलने फूलने का आशीर्वाद दिया, उसकी खूब सेवा की, तारीफ की.. दुसरे पौधे को उन्होंने खूब डांट लगे, कोसा, बुरा बोला, दुत्कारा और शाप जैसे बोले की तू नही फलेगा, तू नही बढेगा.. नतीजा क्या हुआ ? जिसको पुचकारा वो पौधा समृध हो गया जिसको दुत्कारा वः पौधा सुख गया, मुरझा गया और अंततः मर गया. जो बात पौधों के लिए सच है, मनुष्य के लिए सच है, जीवों के लिए सच है, वह बात समाज, जाती और राष्ट्र के लिए भी सच है. आखिर कैसे कोई देश कोई समाज 1 बड़े नेता के पीछे उठकर चल देता है, आखिर क्या होता है उस नेता की वाणी में और व्ही देश व्ही समाज जब उस वाणी को बरसो से नही सुनता तो अधमरा सा , शीण सा, मर सा जाता है.. ऐसा hi हुआ है हमारे देश के साथ . जैसे वह एक पौधा गलत बातें सुनकर hi खत्म हो गया, उसी प्रकार पिछले 350 वर्षों से हम भी भारत के गलत सलत इतिहास हो पढ़कर, रटकर, उसी को सच मानकर अपने hi राष्ट्र को गाली देने लग गये. बिना...

जनता की समझ

एक छोटी सी कहानी से उम्मीद है बात समझ आएगी । बचपन में माँ ने डांटा डपटा और जबरदस्ती विद्यालय भेजा । हमको तब समझ नही थी की क्या विद्यालय में मिलेगा किसलिए जाना जरूरी किसलिए प...

गुरुग्राम में 21-22 नवम्बर राजीव दीक्षित जी का शिविर

🌅 संकल्प शिविर 🌅 🌷भाई राजीव दीक्षित🌷      मित्रों !      🙏नमस्कार 🙏 मोक्ष क्या है? राजीव भाई के शब्दों में- जो व्यक्ति अपने दुःखों को दूर कर ले व दूसरों के दुःखों को दूर करने ...

भारत में जेहाद

० ४ परिशिष्ट- १ संकलन- डॉ. कृ. व. पालीवाल ये कुरान की वे आयतें हैं जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, जिहाद और घृणा फैलाने का संदेश देती हैं। सभी आयतें मक्तवा अल-हसनात, रामपुर (उत्तर प्रदेश) द्वारा प्रकाशित कुरान मजीद (१९८०) मुहम्मद फारुक खाँ के हिन्दी अनुवाद से ली गई हैं।       १. गैर-मुसलमान शत्रु समान १.  जो कोई अल्लाह और उसके 'फरिश्तों' और उसके 'रसूलों' और 'जिबरील' और 'मीकाइल' का शत्रु हुआ तो ऐसे 'काफिरों' का शत्रु अल्लाह है  (२ : ९८, पृ. १४१) २.  निस्संदेह 'काफिर' तुम्हारे (ईमानवालों के) खुले दुश्मन हैं  (४ : १०१, पृ. २३९) ३.  और जो कोई अल्लाह और उसके 'रसूल' का विरोध करें तो निस्संदेह अल्लाह भी कड़ी सजा देने वाला है।  (८ : १३, पृ. ३५१) ४.  ओ ईमान वालो!'मुश्रिक' (मूर्तिपूजक) तो नापाक हैं। तो इस वर्ष के पश्चात्‌ ये 'मस्जिदें हराम' (काबा) के पास फटकने न पाऐं।'  (९ : २८, पृ. ३७१) ५.  निसंदेह अल्लाह ने 'काफिरों' के लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी हैं।  (४ : १०२, पृ. २४०) ६.  जिन...

मैक्समूलर द्वारा वेदों का विकृतिकरण

Image
भारत के लोगों को फ्रेडरिक मैक्समूलर का परिचय कराने की आवश्यकता नहीं हैं क्योंकि ब्रिटिश शासनकाल में ब्रिटिश राजनीतिज्ञों, प्रशासकों और कूटनीतिज्ञों ने उसे एक सदी (१८४६-१९४७) तक लगातार हिन्दुओं का एक अभिन्न मित्र और वेदों के महान विद्वान के रूप में प्रस्तुत किया है, परन्तु सत्य इसके विपरीत है। वास्तव में वह हिन्दुओं और हिन्दू धर्मशास्त्रों का एक महान शत्रु था। लेकिन दुर्भाग्य से, उस समय के ही नहीं, बल्कि आज के हिन्दू भी उसके उद्‌देश्य व कार्य के दूरगामी प्रभाव को समझने में असफल रहे हैं क्योंकि मैक्समूलर ने अपनी लेखनी की चतुराई द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप और वेद भाष्य के विकृतीकरण के उद्‌देश्य को बड़े योजनाबद्ध तरीके से छिपाए रखा, यहाँ तक कि उसके निधन के बाद सन्‌ १९०१ में प्रकाशित स्वलिखित जीवनी में भी उसे उजागर नहीं किया। उन्नीसवी सदी के हिन्दू, मैक्समूलर और उसके मैक्समूलरवाद को पहचानने और समझने में पूरी तरह असफल रहे हैं क्योंकि हिन्दुओं के आमतौर पर अत्यंत सीधे-सादे होने के कारण उन्होंने उसे ही सच मान लिया जो कि मैक्समूलर ने कहा और लिखा। इसके अतिरिक्त उसे आजीवन अप्रत्यक्ष रूप् से अंग्रेज...